বুধবার, নভেম্বর ১৩

ইচ্ছাপূরণের হোম ডেলিভারি/ मनोकामना की होम डिलीवरी

প্রতাপ সোমবন্শী

নীল, হলুদ রং-বেরঙের চকমকে কাপড়ে মোড়ানো
মেয়েদের দল বেড়িয়ে পড়েছে,
সস্তা মুখরঞ্জনীর আস্তরণে নিজেদের ঢেকে,
টগবগিয়ে ফুটছে ভেতর থেকে,
সবার মন উল্লাসে টইটম্বুর,
উড়ে চলে প্রজাপতির মত,
হইহুল্লোড় করছে,
পিছিয়ে পড়া সখীদের ডেকে চলেছে।
আজ নবরাত্রির নবমী।
সরু সরু গলি থেকে বেরিয়ে
মেয়েরা চলেছে বড় বড় অট্টালিকায়…
কন্যা-ভোজনের আশায়।
আজ কেউ জানতে চাইবে না এদের
জাতি, বর্ণ, শ্রেণী…
কেউ ওজন করবে না এদের বাজারি নিক্তিতে;
আজ তো ইচ্ছাপূরণের হোম ডেলিভারি হয়ে এসেছে তারা।
পাঁচ-দশ টাকার দক্ষিণা, হালুয়া-পুরির নৈবেদ্য
আর সস্তা উপহারের বিনিময়ে
এরা আজ পূণ্য বিলোবে।
এদেরই এঁটো প্রসাদে আজ
গৃহস্থের ভাগ্য ফিরবে, সমৃদ্ধি আসবে।
তাই আজ প্রতিটা ঘরের দরজায়,
প্রতীক্ষারত চোখের সারি,
তাই দরজার বাইরে নেমে এসেছে
উৎসুক মানুষের ঢল,
এক, দুই, তিন, চার, পাঁচ…… নয় জন কন্যা,
আর একটি দুষ্টু ছেলে।
সর্ব-কর্ম বিধি-বিধান মেনে করা হলে
তবেই পাওয়া যাবে পূণ্যের পূর্ণ ফল।
মেয়েরা আজ বেজায় খুশি…
তাদের মায়েরা যে বাড়িতে মাজে বাসন-
সে বাড়িতেই আজ তাদের কন্যা-ভোজনের আসন।
ভরপেট খাওয়ালে পূণ্য মেলে বেশি,
তাই আজ কোন কার্পণ্য নয়।
ওদিকে মেয়েরা খালি রাখতে চায়
পেটের একোণা- সেকোণা,
কয়েকটা বাড়ি আরো, আরও মিলবে দক্ষিণা।
আরও কিছু খাবারের থলি
বাড়িতে আসবে ওদের হাত ধরে।
একটা দিনের কয়েকটা ঘন্টার জন্যেই সই,
তাদের ‘নারীজন্মের’ অভিশাপ ঘুচবে।

 

नीले, पीले, रंग-बिरंगे, चटखीले कपड़ों से लदी
लड़कियों के झुण्ड निकल पड़े हैं
बाहर ये सस्ते मेकअप के सामानों से सजी हैं
और भीतर  फूट रहा है
इन सबके मन में उल्लास
फुदक रही हैं ये तितलयों के जैसी
दौड़ रहीं हैं, चिल्ला रही हैं
पीछे रह गई सहेलियों को बुला रही हैं
आज नवरात्र के नवमी का दिन है
संकरी-संकरी गलियों से निकली लड़कियां
बड़ी-बड़ी हवेलियों और मल्टी स्टोरी फ्लैट्स में
कन्या भोज के लिए जा रही हैं
आज के दिन कोई नहीं पूछेगा इनकी जाति नहीं देखेगा रंग
कोई नहीं तौलेगा इनकी औकात
आज तो मनोकामना होम डिलीवरी है ये लड़कियां
जो पांच-दस रूपए की दक्षिणा, हलवा पूड़ी
और कुछ घटिया उपहारों के एवज में
पुण्य पहुंचाने जा रही हैं
दरवाजे-दरवाजे जहाँ इनके
जूठन गिराने से जागेगा भाग्य, आएगा वैभव
इसलिए हर दरवाजे पर मौजूद हैं
इनके लिए इंतजार वाली आंखे
उतावले लोग सड़को पर चले आए हैं
कहीं देर होने से चुक न जाए
भगवान की झोली का पुण्य
वे गिन रहे हैं 1,2,3,4,5….9लड़कियां
और सिर्फ एक लड़का लंगूर
हर काम विधान से जरूरी है
तभी तो मिलेगा पूरा फल
लड़कियां खुश है कि जिन घरों में
उनकी माँएं करती है चौका-बासन
आज उन्हीं घरों में मिला है आसन
जितना खाएंगी लड़कियां उतना आएगा पुण्य
ज्यादा से ज्यादा खिलाने की जिद जारी है
लड़कियां है कि खाली रखना चाहती है
पेट में कई कोने
ताकि जा सकें वो कई और घर
कमा सकें कुछ और दक्षिणा,
घर ले जा सके खाने से भरे सामानों के थैले
ताकि एक दिन के कुछ घंटों के लिए ही सही
शापित होने के कलंक से
उबर तो जाएं ये लड़कियां

প্রতাপ সোমবন্শী‌, হিন্দি দৈনিক হিন্দুস্তানের এক্সিকিউটিভ এডিটর। ভারতের খনি অঞ্চলের মহিলা শ্রমিকদের নিয়ে কাজ করার জন্য পেয়েছেন সাউথ এশিয়া মিডিয়া ফেলোশিপ অ্যাচিভার পুরস্কার। বুন্দেলখণ্ড অঞ্চলে কৃষক আত্মহত্যা নিয়ে লেখার জন্য পেয়েছেন আন্তর্জাতিক কেসিকে পুরস্কার। তাঁর প্রথম কবিতার বই ‘ইতবার ছোটা পড় গয়া’ হিন্দি ভাষার একটা বেস্টসেলার। মালালা ইউসুফজাইয়ের নোবেল পুরস্কার পাওয়ার দিন তাঁকে নিয়ে লেখা প্রতাপের কবিতা পড়া হয়েছিল ভয়েজ অব অ্যামেরিকা টেলিভিশন চ্যানেলে।   

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